बिलासपुर। जिले के बिल्हा क्षेत्र से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ मां नारायणी राइस प्रोडक्ट (राइस मिल) पर विभागीय अधिकारियों से सांठ-गांठ कर शासन को भारी आर्थिक नुकसान पहुँचाने के गंभीर आरोप लगे हैं।
विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, उक्त राइस मिल पर वर्ष 2024-25 का चावल बकाया बताया जा रहा है। नियमों के अनुसार ऐसी स्थिति में राइस मिल को वर्ष 2025-26 के लिए पंजीयन एवं कस्टम मिलिंग की अनुमति नहीं दी जानी थी, लेकिन इसके बावजूद कथित तौर पर फर्जी तरीके से अनुमति हासिल कर ली गई।
सूत्र बताते हैं कि राइस मिल परिसर में पहले से मौजूद एक ही यूनिट को दिखाकर दो मिल यूनिट दर्शाई गई, और फूड कंट्रोलर व एरिया फूड इंस्पेक्टर की कथित मिलीभगत से फर्जी भौतिक सत्यापन, फोटो और दस्तावेज़ों के आधार पर पंजीयन करवा लिया गया। इसके बाद वर्ष 2025-26 का धान उठाकर पिछले वर्ष 2024-25 का बकाया चावल “पाटने” की रणनीति अपनाई जा रही है।
कवर्धा का “मुसवा” अब बिलासपुर में?
गौरतलब है कि बीते दिनों कवर्धा जिले से सरकारी गोदामों और धान उपार्जन केंद्रों में करोड़ों रुपये मूल्य के धान के गायब या बर्बाद होने का मामला सामने आया था।
तत्कालीन अधिकारियों ने धान के चूहों/दीमकों (स्थानीय भाषा में “मुसवा/मूसा”) द्वारा खा जाने की बात कही थी, जिसने पूरे प्रदेश में हड़कंप मचा दिया था।
अब बिलासपुर में सामने आ रहा यह मामला कहीं उसी “मूसा वाला मॉडल” की पुनरावृत्ति तो नहीं—यह सवाल आम जनता और प्रशासन दोनों के सामने खड़ा हो गया है।
नियम क्या कहते हैं, और यहां क्या हुआ?
सूत्रों के अनुसार—
- जिन राइस मिलरों ने विगत वर्ष में 60–70% चावल जमा कर दिया हो, केवल उन्हें ही अगले वर्ष कस्टम मिलिंग की अनुमति दी जानी थी।
- लेकिन मां नारायणी राइस मिल का पूरा चावल अब तक जमा नहीं हुआ, इसके बावजूद वर्ष 2025-26 में धान उठाने की अनुमति दे दी गई।
- सूत्र यह भी बताते हैं कि एरिया फूड इंस्पेक्टर की कथित भूमिका संदिग्ध है, जिन्होंने नियमों को दरकिनार कर राइस मिलर को अघोषित संरक्षण प्रदान किया।
किसका संरक्षण? किसकी रणनीति?
जब शासन-प्रशासन लगातार धान उपार्जन केंद्रों और राइस मिलों का निरीक्षण कर रहा है, ऐसे में यह सवाल बेहद गंभीर है कि—
यदि सूत्रों की जानकारी सही है, तो इस अवैध गतिविधि को संरक्षण कौन दे रहा है?
किस स्तर पर रणनीति बनाई गई?
किन-किन अधिकारियों की मिलीभगत है?
और सबसे अहम—शासन को हो रहे करोड़ों के नुकसान की जवाबदेही कौन लेगा?
जांच नहीं हुई तो “मूसा कांड” की आशंका
यदि इस पूरे मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच नहीं होती, तो आने वाले समय में बिलासपुर भी कवर्धा जैसे धान घोटाले की सुर्खियों में आ सकता है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि खबर के प्रकाशन के बाद शासन-प्रशासन क्या कदम उठाता है—जांच होती है या फिर मामला फाइलों में ही दबा दिया जाता है।
नोट (अत्यंत महत्वपूर्ण)
👉 इस पूरे प्रकरण से जुड़े कुछ अहम दस्तावेज़, फोटो और तकनीकी जानकारियां हमारे विश्वसनीय सूत्रों के माध्यम से प्राप्त हुई हैं।
👉 अगले अंक में इन दस्तावेज़ों के साथ पूरे खेल का विस्तृत खुलासा किया जाएगा।
(खबर विश्वसनीय सूत्रों पर आधारित है। सत्यता की पुष्टि के लिए संबंधित विभागीय पक्ष से जवाब आमंत्रित है।)








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