बिलासपुर, छत्तीसगढ़: प्रदेश की प्रमुख केंद्रीय जेलों में शामिल बिलासपुर सेंट्रल जेल एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। पिछले कुछ महीनों में एक के बाद एक सामने आई घटनाओं ने जेल की सुरक्षा, निगरानी और प्रशासनिक व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सिर्फ घटनाओं का नहीं, बल्कि यह भी है कि आखिर इन घटनाओं से सबक किसने लिया और जिम्मेदारी किस स्तर पर तय हुई?
23 जून 2026 को पॉक्सो मामले में बंद विचाराधीन कैदी नीलू जगत (25) की जेल के भीतर कथित रूप से एक सजायाफ्ता कैदी के हमले में मौत हो गई। आरोप है कि उस पर सीमेंट के स्लैब से हमला किया गया था। हाई सिक्योरिटी जेल के भीतर हुई इस घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।
इसके महज छह दिन बाद, 29 जून 2026 को हत्या के मामले में सजा काट रहे जनकराम साहू (62) की तबीयत बिगड़ने के बाद इलाज के दौरान मौत हो गई। एक ही महीने में दो कैदियों की मौत ने जेल की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सवाल और गहरे कर दिए।
इससे पहले फरवरी 2026 में हत्या के मामले में बंद कैदी विकास कश्यप ने जेल की रसोई में हंसिए से अपना गला काट लिया था। गंभीर हालत में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इस घटना ने जेल के भीतर निगरानी, प्रतिबंधित वस्तुओं की उपलब्धता और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए।
अब जुलाई 2026 में एक और चौंकाने वाली घटना सामने आई। डबल मर्डर मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे राहुल उर्फ विकेश कंवर (46) ने जेल परिसर में संचालित गैसीफायर प्लांट की जलती भट्ठी में छलांग लगा दी, जिससे उसकी मौत हो गई। घटना के बाद प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और जांच शुरू की गई।
इन घटनाओं के बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी राज्य की जेलों में कैदियों की मौतों को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। अदालत के समक्ष रखे गए आंकड़ों में बिलासपुर सेंट्रल जेल में कैदियों की मौतों का उल्लेख किया गया था और जेल प्रशासन से जवाब मांगा गया था।
अब सबसे बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी?
जब जेल के भीतर कोई गंभीर घटना होती है तो क्या केवल ड्यूटी पर तैनात सिपाहियों या निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई और जांच करके मामला खत्म कर दिया जाता है?
यदि किसी घटना के बाद सिपाहियों को निलंबित किया जाता है, तो क्या उच्च अधिकारियों की निगरानी और प्रशासनिक जिम्मेदारी की भी उसी गंभीरता से समीक्षा होती है?
- क्या जेल अधीक्षक के स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था की नियमित समीक्षा की जाती है?
- यदि निगरानी व्यवस्था प्रभावी थी, तो जेल के भीतर एक कैदी की हत्या कैसे हुई?
- लगातार कुछ ही दिनों में दो कैदियों की मौत क्यों हुई?
- एक उम्रकैद का कैदी गैसीफायर प्लांट जैसे संवेदनशील क्षेत्र तक आखिर पहुंचा कैसे?
- क्या संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा, सीसीटीवी निगरानी, गश्त और कर्मचारियों की ड्यूटी व्यवस्था की स्वतंत्र जांच हुई?
- क्या इन घटनाओं के बाद जेल अधीक्षक की निगरानी व्यवस्था की भी जांच की गई?
- यदि जांच हुई तो रिपोर्ट क्या कहती है?
और सबसे बड़ा सवाल—
- आखिर लगातार गंभीर घटनाओं के बावजूद जेल अधीक्षक की सुरक्षा एवं निगरानी व्यवस्था पर जवाबदेही कब तय होगी?
- यदि जेल प्रशासन की व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी थी, तो बार-बार ऐसी घटनाएं क्यों सामने आ रही हैं?
- और यदि व्यवस्था में कोई कमी सामने आई है, तो उसे दूर करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए?
बिलासपुर सेंट्रल जेल में होने वाली प्रत्येक घटना सिर्फ एक प्रशासनिक मामला नहीं है। यह कैदियों की सुरक्षा, जेल कर्मचारियों की जिम्मेदारी, प्रशासनिक निगरानी और जनता के विश्वास से जुड़ा विषय है। इसलिए अब जेल विभाग, जेल मुख्यालय, जिला प्रशासन और राज्य सरकार को इन सवालों का स्पष्ट, तथ्यात्मक और पारदर्शी जवाब देना चाहिए।
क्योंकि सवाल यह नहीं कि कार्रवाई हुई या नहीं… सवाल यह है कि कार्रवाई की जिम्मेदारी केवल नीचे तक सीमित क्यों रहे? क्या जवाबदेही ऊपर तक तय होगी?
जब छत्तीसगढ़ की स्थानांतरण नीति में एक ही स्थान पर दो वर्ष या उससे अधिक अवधि से पदस्थ अधिकारियों को स्थानांतरण प्रक्रिया में लिया जा सकता है, तो बिलासपुर सेंट्रल जेल के अधीक्षक की लगभग चार वर्ष की लगातार पदस्थापना की विभागीय समीक्षा कब और किस आधार पर हुई?
क्या जेल विभाग में केंद्रीय जेल अधीक्षक के लिए कोई अलग कार्यकाल/स्थानांतरण नियम लागू है? यदि है, तो वह नियम सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?”






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